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जज़्बा-ऐ-तन्हाई

1 min read Originally published on Blogspot, 2008

मेरे ब्लॉग के सभी पाठकों को पीयूष राज सख्त जानी का तह-ऐ-दील से आदाब-ओ-सलाम। आप सभी का बहुत बहुत खैर मकतम करते हुए मैं आपसे सभी के दरम्यान अपना एक छोटा सा कलाम पेश कर रहा हूँ। ये शायरी उन दिलों की है जिन्हे मैं अपने जिन्दगी के सबसे काले दीनों में शुमार करता हूँ। अर्ज़ कीया है :

जिन्दगी ग़म की एक सौगात नई लाती है ,
रोज़ मरकर भी मुझे मौत नहीं आती है ।

आँख मीचे मैं करवटें बदलता रहता हूँ ,
अब तों नींद भी किश्तों में ही मिल पाती है ।

जीन निगाहों में बसी थी कभी सूरत मेरी ,
गर मेरी ऑर भी देखे तो पलट जाती है ।

रोज़ रोंज़े रखे थे मैंने भी कल तक दील से ,
आज तो ईद मुहर्रम सी नज़र आती है ।

कल जहाँ तक थे मेरे नाम के चर्चे “सख्तु “,
मेरे ही नाम से हर शाम जवाँ होती थी ।

बाग़ वो अहद का ख़ुद ही तो उजाड़ा मैंने ,
जिस्के हर फूल से खुशबू मेरी ही आती थी ।

ग़म गुसारों की बेवफाई से रूस्वा होके ,
जब कभी भी आँख छलछलाती है ,

रोके खुदपर कभी वीराने में ,
चश्म -ऐ -शम्मा शब -ऐ -रोज़ बुझ सी जाती है ।


आपका अपना,
सुखनवर सख्त जानी

— Piyush

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