जीवन, युद्ध, मित्र, और मिठास.....

जीवन की जिव्हा पर मेरे, कुछ मीठा मीठा चिपका है, मैं मन्त्र-मुग्ध हूँ, विस्मित हूँ, इससे ज़्यादा, मैं क्या बोलूं? मैं योद्धा हूँ, मेरा परिचय; मेरा जीवन संग्राम में है, मैं अर्जुन हूँ, हूँ देव-पुत्र, निर्भय हूँ, और कुछ हुनर भी है, इस युग में सारथि नहीं मेरा, मेरा कृष्ण मुझी में बसता है. जब साहस मेरा डोले तब, कुछ शूर-वीर मिल जाते हैं, जब सपना मेरा टूटे तब, सब ढाढ़स मुझे बँधाते हैं, हैं भाई मेरे, कुछ मित्र मेरे, जिनका मुझमे विश्वास अटल, इनके सम्मान का विषम कवच, मुझे तीर भेद नहीं पाते हैं, कभी लड़ते जब गिर जाता हूँ, जब गिरके ठोकर खाता हूँ, सब ईष्ट-मित्र आ जाते हैं, मेरी जान बचा ले जाते हैं, और सच्चा शूर-वीर कहकर, मुझे युद्ध में वापस लाते हैं, फिर शंख नाद बज उठता है, फिर रण-भेरी आह्वान करे, जब साहस वापस आ जाए, फिर अश्त्र-शस्त्र से कौन डरे? मैं फ़िर पूरी जी-जान लगा, फिर युद्ध-जीतने आता हूँ, और बरसों से जाना है यही, हर बार जीत के जाता हूँ!! साहस और श्रम मिलके जो, आत्म-विश्वास की रचना करते हैं, फिर जीत तो मानो पक्की है, जो डरते हैं, वही मरते हैं. ये युद्ध नहीं पौराणिक कुछ, ये जीवन का है चक्र-युद्ध, कुछ पाने की अभिलाषा हो, तो करें जगत से वीर-युद्ध, जीवन एक बहती गंगा है, हम मीन-मनुज सब एक से हैं, जब चट्टानों से बहना हो, है ऊँची गिरती धार-युद्ध. जब जीत के ख्याति मिलती है, सब मित्र-सहोदर आते हैं, तब जीत की मीठे रस में, कैसे लोट-पोट हो जाते हैं. जीवन चलता जाता है फिर, एक युद्ध नया लड़ने के लिए, फिर नयी बुलंदी पाने को, मूँह मीठा करके चलते हैं. जीवन की जिव्हा पर मेरे, कुछ मीठा मीठा चिपका है, मैं मन्त्र-मुग्ध हूँ, विस्मित हूँ, इससे ज़्यादा, मैं क्या बोलूं?
मित्रों,
बस इतना कहना काफ़ी होगा की इस काव्य को सरल हिन्दी में कहना दुष्कर था, हमारी संस्कृत-निष्ट हिन्दी ने इसको इसका सच्चा सम्मान दिया…आशा है आप सब को भी पसंद आएगी ये कविता, जो की ‘वीर रस’ में लिखी गयी है…और मेरा ये विश्वास है, की English के बहाव में हिन्दी हमसे अलग नहीं हुई,बल्कि इस तेज़ बहाव में वो अब तह में आ बैठी है…
कभी कभी इस हिन्दी को कुरेदना, और सतह पे लाना अच्छा लगता है!!
आप सबके दृष्टिकोण हमें आपके पत्रों और ब्लॉग पर दी गयी टिप्पणी से भली भाँति मिलते हैं…और सच्चे मन से हम आपके इस सु-व्यवहार के आभारी हैं…
आते रहिए…लिखते रहिए…ब्लॉग का आनंद बना रहे…
सुख-प्रार्थी,
‘सख़्त-जानी’
Akhouri Piyush Raj ‘Sakht Jaani’
— Piyush
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